उर्द की खेती
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उर्द की खेती (Black Gram Farming) – उन्नत तकनीक और साडा वीर उत्पादों के साथ अधिक उत्पादन

उर्द भारत की प्रमुख दलहनी फसल है। इसे उड़द या Black Gram भी कहा जाता है। यह कम समय में तैयार होने वाली लाभदायक फसल है। उर्द की दाल प्रोटीन से भरपूर होती है और बाजार में इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है।

उर्द की खेती खरीफ, जायद और कुछ क्षेत्रों में रबी मौसम में भी की जाती है। यह फसल मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है। यदि किसान सही किस्म, संतुलित पोषण, रोग नियंत्रण और उचित स्प्रे प्रबंधन अपनाएं तो उर्द से अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।

उर्द की खेती का महत्व

  • कम अवधि में तैयार होने वाली फसल।
  • दालों में प्रोटीन का अच्छा स्रोत।
  • मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने में सहायक।
  • कम लागत में अच्छा लाभ।
  • फसल चक्र के लिए उत्तम फसल।

जलवायु

उर्द के लिए गर्म और मध्यम आर्द्र जलवायु उपयुक्त होती है। 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके विकास के लिए अच्छा माना जाता है। अधिक जलभराव उर्द की फसल के लिए हानिकारक होता है।

भूमि

उर्द की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। मिट्टी का pH 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए।

खेत की तैयारी

खेत की 2 से 3 जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें। अंतिम जुताई के समय सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाएं। खेत में पानी रुकने की स्थिति नहीं होनी चाहिए।

उन्नत किस्में

  • PU-31
  • Pant U-31
  • Narendra Urd-1
  • T-9
  • LBG-752

बुवाई का समय

  • खरीफ: जून से जुलाई
  • जायद: मार्च से अप्रैल
  • रबी: कुछ क्षेत्रों में अक्टूबर-नवंबर

बीज दर

उर्द की बुवाई के लिए लगभग 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। बीज स्वस्थ, रोगमुक्त और अच्छी अंकुरण क्षमता वाला होना चाहिए।

बीज उपचार

बुवाई से पहले बीज को राइजोबियम कल्चर और पीएसबी कल्चर से उपचारित करें। इससे पौधों की जड़ वृद्धि अच्छी होती है और फसल में नाइट्रोजन स्थिरीकरण बेहतर होता है।

साडा वीर उत्पादों का उपयोग

1. साडा वीर (Sada Veer)

उर्द की फसल में साडा वीर का उपयोग जड़ विकास, पौधों की बढ़वार, फूलों की संख्या और दाना भराव में सहायक हो सकता है। यह मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों को पौधों के लिए उपयोगी बनाने में मदद करता है।

  • जड़ विकास में सहायता।
  • फसल की बढ़वार में सुधार।
  • फूल और फलियों की संख्या बढ़ाने में सहायक।
  • मिट्टी की सक्रियता बढ़ाने में उपयोगी।

2. 4G साडा वीर (4G Sadaveer)

4G साडा वीर सीवीड एक्सट्रैक्ट और ऑर्गेनिक एसिड आधारित उत्पाद है। यह पौधों की वृद्धि, शाखाओं के विकास, फूल और फलियों की गुणवत्ता सुधारने में उपयोगी हो सकता है।

प्रयोग विधि: 2 से 4 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

  • पहला स्प्रे: बुवाई के 25-30 दिन बाद।
  • दूसरा स्प्रे: फूल आने से पहले।
  • तीसरा स्प्रे: फली बनने की अवस्था में।

3. साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट

उर्द में जिंक, आयरन, मैंगनीज, कॉपर और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से पौधों की वृद्धि रुक सकती है। साडा वीर मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट फसल को संतुलित सूक्ष्म पोषण देने में सहायक है।

  • पत्तियों की हरियाली बढ़ाने में सहायक।
  • फूल एवं फलियों के विकास में उपयोगी।
  • दाना भराव में सहायता।
  • पौधों को स्वस्थ रखने में मददगार।

4. फंगस फाइटर (Fungus Fighter)

उर्द की फसल में पत्ती धब्बा, जड़ गलन और अन्य फफूंदजनित रोगों का प्रकोप दिखाई दे सकता है। फंगस फाइटर फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और फफूंदजनित समस्याओं को कम करने में सहायक जैविक उत्पाद है।

प्रयोग विधि: 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

5. फर्राटा (FARRATA 500 ML)

फर्राटा एक नॉन-आयोनिक स्प्रे एडजुवेंट है। इसे कीटनाशक, फफूंदनाशक, घुलनशील उर्वरक या टॉनिक के साथ मिलाकर उपयोग करने से घोल का फैलाव, चिपकाव और अवशोषण बेहतर हो सकता है।

  • स्प्रे का फैलाव बेहतर करता है।
  • पत्तियों पर घोल की पकड़ बढ़ाता है।
  • स्प्रे की प्रभावशीलता बढ़ाने में सहायक।
  • पानी और पोषक तत्वों की उपयोगिता बेहतर करता है।

6. साडा वीर स्प्रे (Sada Veer Spray)

साडा वीर स्प्रे फोलियर स्प्रे के लिए उपयोगी उत्पाद है। इसे उर्द की फसल में पौधों की बढ़वार, रोग प्रतिरोधक क्षमता और फली विकास में सहायता के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

मात्रा: 1 से 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

उर्वरक प्रबंधन

उर्द दलहनी फसल है, फिर भी प्रारंभिक विकास के लिए संतुलित पोषण आवश्यक है। खेत की उर्वरता के अनुसार खाद और उर्वरक डालें। फास्फोरस और सल्फर का विशेष महत्व होता है।

सिंचाई

खरीफ में सामान्यतः वर्षा पर्याप्त होती है। जायद फसल में 3 से 4 सिंचाई आवश्यक हो सकती हैं। फूल आने और फली बनने की अवस्था में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली निराई-गुड़ाई करें। आवश्यकता होने पर 40 से 45 दिन बाद दूसरी निराई करें। खरपतवार फसल से पोषक तत्व और नमी छीन लेते हैं।

प्रमुख रोग

पीला मोजैक रोग

यह उर्द का प्रमुख रोग है। इसमें पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और पौधे कमजोर हो जाते हैं। सफेद मक्खी इस रोग को फैलाती है।

पत्ती धब्बा रोग

इस रोग में पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे बन जाते हैं। अधिक नमी और घनी फसल में इसका प्रकोप बढ़ता है।

जड़ गलन

जलभराव और खराब जल निकासी के कारण जड़ गलन की समस्या हो सकती है। खेत में पानी जमा न होने दें।

प्रमुख कीट

  • सफेद मक्खी
  • माहू
  • थ्रिप्स
  • फली छेदक

कीटों की निगरानी नियमित करें। आवश्यकता होने पर उचित कीटनाशक का प्रयोग करें। स्प्रे के साथ फर्राटा मिलाने से घोल का फैलाव और प्रभाव बेहतर हो सकता है।

फूल और फली विकास के लिए स्प्रे शेड्यूल

फसल अवस्थाउत्पादउद्देश्य
20-25 दिनसाडा वीर + 4G साडा वीरजड़ और पौधों की बढ़वार
30-35 दिनमल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंटसूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति
फूल आने से पहले4G साडा वीर + साडा वीर स्प्रेफूल और शाखाओं का विकास
फली बनने परसाडा वीर + फंगस फाइटरफली विकास और रोग सुरक्षा
रोग दिखाई देने परफंगस फाइटरफफूंदजनित रोगों से सुरक्षा

कटाई

जब 70 से 80 प्रतिशत फलियां पक जाएं और पौधे पीले पड़ने लगें, तब फसल की कटाई करें। कटाई के बाद फसल को धूप में सुखाएं और मड़ाई करके दाने अलग करें।

उत्पादन

सामान्य परिस्थितियों में उर्द की उपज 8 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिल सकती है। अच्छी किस्म, संतुलित पोषण, सही स्प्रे और रोग नियंत्रण से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

निष्कर्ष

उर्द की खेती कम अवधि, कम लागत और अच्छी बाजार मांग के कारण किसानों के लिए लाभदायक है। यदि किसान सही समय पर बुवाई, संतुलित पोषण, रोग-कीट प्रबंधन और साडा वीर, 4G साडा वीर, मल्टी माइक्रो न्यूट्रिएंट, फर्राटा, फंगस फाइटर और साडा वीर स्प्रे जैसे उत्पादों का सही उपयोग करें, तो फसल की बढ़वार, फूल, फलियां और दाना भराव बेहतर हो सकता है।

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